CBSE की OSM प्रक्रिया पर बवाल, जानें दुनिया के बड़े एग्जाम में कैसे चेक की जाती हैं कॉपियां?


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  • सीबीएसई ने 12वीं के मूल्यांकन में डिजिटल सिस्टम लागू किया.
  • छात्रों की स्कैन की गई कॉपियां धुंधली, पन्ने गायब मिले.
  • यूके, आईबी बोर्ड कई साल से कर रहे डिजिटल मार्किंग.
  • तकनीक सहायक है, इंसानी सूझबूझ का विकल्प नहीं.

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने इस साल कक्षा 12 के मूल्यांकन में एक बहुत बड़ा बदलाव करते हुए पूरी तरह से डिजिटल ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम को लागू किया है. लेकिन इस नई व्यवस्था के आते ही छात्रों और अभिभावकों के बीच हड़कंप मच गया है. कई छात्रों ने शिकायत की है कि उनकी स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाएं धुंधली थीं, कुछ के पन्ने गायब थे, तो कुछ को किसी दूसरे ही छात्र की कॉपी दिखा दी गई. इस तकनीकी गड़बड़ी ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है कि क्या भारत का सबसे बड़ा परीक्षा बोर्ड इस बड़े डिजिटल बदलाव के लिए पूरी तरह तैयार था और दुनिया के बाकी देश कॉपियों को जांचने के लिए किस तकनीक का सहारा लेते हैं. 

क्या है ऑन-स्क्रीन मार्किंग व्यवस्था?

ऑन-स्क्रीन मार्किंग या ओएसएम (OSM) असल में कॉपियों के डिजिटल मूल्यांकन की एक आधुनिक प्रणाली है. इस व्यवस्था के तहत शिक्षकों को जांचने के लिए कागज की असली कॉपियां नहीं दी जातीं, बल्कि वे कंप्यूटर स्क्रीन पर कॉपियों की स्कैन की गई डिजिटल कॉपी को देखकर नंबर देते हैं. छात्रों को अपनी परीक्षा हमेशा की तरह पारंपरिक तरीके से कागज की उत्तर पुस्तिकाओं पर ही लिखनी होती है. परीक्षा खत्म होने के बाद इन सभी कॉपियों को सुरक्षित केंद्रों पर स्कैन किया जाता है. इसके बाद छात्रों की पहचान को गुप्त रखकर इन डिजिटल फाइलों को देश भर के मूल्यांकनकर्ताओं को ऑनलाइन भेज दिया जाता है. 

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सीबीएसई का पुराना अनुभव और प्रयास

सीबीएसई का कहना है कि डिजिटल तरीके से कॉपियों को जांचने का यह विचार उनके लिए बिल्कुल नया नहीं है. बोर्ड ने सबसे पहले साल 2014 में भी ओएसएम सिस्टम को अपनाने की दिशा में कदम बढ़ाया था, लेकिन उस समय उपयुक्त और उन्नत स्कैनिंग तकनीक उपलब्ध न होने के कारण इस योजना को बीच में ही रोकना पड़ा था. उस दौर में कॉपियों को स्कैन करने के लिए उनकी बाइंडिंग को बीच से काटना पड़ता था, जिससे कॉपियों के पन्ने आपस में मिक्स होने या खो जाने का बहुत बड़ा खतरा बना रहता था. इसी वजह से उस समय इस डिजिटल सिस्टम को लागू नहीं किया जा सका था.

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नई व्यवस्था को लागू करने का कारण

सीबीएसई के अनुसार, इस साल इस डिजिटल सिस्टम को पूरी तरह लागू करने का मुख्य उद्देश्य मूल्यांकन प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित, कुशल और एक समान बनाना था. बोर्ड का मानना था कि ऑनलाइन कॉपियां जांचने से अलग-अलग क्षेत्रों के शिक्षकों द्वारा नंबर देने में होने वाले अंतर को कम किया जा सकेगा. इसके साथ ही, नंबरों को जोड़ने में होने वाली मानवीय या लिपिकीय गलतियों को पूरी तरह खत्म किया जा सकेगा. इस सिस्टम से कॉपियां जांचने वाले शिक्षकों की निगरानी भी आसान हो जाती है और पूरी परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और मजबूती आती है.

वैश्विक स्तर पर डिजिटल मार्किंग के नियम

अगर वैश्विक स्तर पर देखें तो ब्रिटेन के प्रमुख परीक्षा बोर्ड जैसे एक्यूए (AQA), ओसीआर (OCR) और पीयरसन एडएक्ससेल (Pearson Edexcel), जो ए-लेवल्स जैसी बड़ी परीक्षाएं आयोजित करते हैं, कई सालों से ऑनलाइन मार्किंग का उपयोग कर रहे हैं. वहां भी सभी कॉपियों को केंद्रीय स्तर पर स्कैन करके परीक्षकों में डिजिटल रूप से बांट दिया जाता है. कई मामलों में तो एक शिक्षक को पूरी कॉपी जांचने के लिए नहीं दी जाती, बल्कि वे हजारों कॉपियों में से केवल एक खास प्रश्न का ही मूल्यांकन करते हैं, जिससे नंबर देने की निरंतरता और सटीकता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है.

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तकनीक बनाम इंसानी सूझबूझ की बहस

ब्रिटेन के परीक्षा नियामक ‘ऑफक्वाल’ (Ofqual) के अनुसार, ऑनलाइन मार्किंग का मुख्य उद्देश्य गुणवत्ता नियंत्रण और परीक्षकों की सख्त निगरानी बढ़ाना था. प्रोफेसर्स की मानें तो ब्रिटिश परीक्षा प्रणाली एशियाई देशों से अलग है क्योंकि वहां निबंध जैसे लंबे उत्तर लिखने होते हैं. तकनीक केवल छात्रों के उत्तरों को जांचने वाले शिक्षकों तक आसानी से पहुंचाने का माध्यम बन सकती है, लेकिन यह छात्रों के ज्ञान का मूल्यांकन करने वाले शिक्षक की जगह कभी नहीं ले सकती है. हाल ही में ऑफक्वाल ने परीक्षाओं में एआई (AI) के इस्तेमाल पर भी गाइडलाइन जारी कर अंतिम फैसले का अधिकार इंसानों के हाथ में ही रखा है.

अंतरराष्ट्रीय बोर्ड में क्या हैं नियम?

इंटरनेशनल बेकलॉरिएट (IB) बोर्ड, जिसकी परीक्षाएं दुनिया के 150 से अधिक देशों में आयोजित की जाती हैं, वह भी डिजिटल मूल्यांकन पर बहुत अधिक निर्भर है. दुनिया भर के परीक्षक ऑनलाइन माध्यम से स्कैन की गई कॉपियों तक पहुंचते हैं, जबकि सीनियर परीक्षक कॉपियों की जांच की गुणवत्ता पर लगातार नजर रखते हैं. इन तमाम अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों से साफ है कि तकनीक का काम केवल इंसानी परीक्षकों की मदद करना है, न कि खुद मूल्यांकन करना. भारत में भी इस सिस्टम को पूरी तरह सफल बनाने के लिए तकनीकी खामियों को दूर करना और शिक्षकों को मानसिक रूप से तैयार करना बेहद जरूरी है.

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