Rising Education Cost in India: स्कूल फीस ही नहीं, कोचिंग से कॉलेज तक… पढ़ाई पर बढ़ता खर्च बन रहा परिवारों के लिए आर्थिक बोझ


Rising Education Cost in India: भारत में लंबे समय से माना जाता रहा है कि बच्चों की शिक्षा पर किया गया खर्च सबसे अहम निवेश होता है. परिवार अपनी दूसरी जरूरतों में कटौती कर सकते हैं, लेकिन बच्चों पढ़ाई पर समझौता नहीं करना चाहते हैं. हालांकि अब स्थिति यह है कि केवल स्कूल फीस भरना ही पर्याप्त नहीं रह गया, ट्यूशन, कोचिंग, ट्रांसपोर्ट, यूनिफॉर्म, किताबें, डिजिटल डिवाइस, एक्स्ट्रा करिकुलम एक्टिविटीज और आगे चलकर कॉलेज फीस जैसी कई जरूरतों ने बच्चों की शिक्षा का खर्च लगातार बढ़ा दिया है. ऐसे में एक्सपर्ट्स का कहना है कि समय रहते वित्तीय योजनाओं नहीं बनाने वाले परिवारों पर भविष्य में बड़ा आर्थिक दबाव पड़ सकता है. 

सरकारी और प्राइवेट स्कूल के खर्चे में बड़ा अंतर 

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के Comprehensive Modular Survey on Education 2025 के अनुसार सरकारी स्कूलों में प्रति छात्र परिवार का औसत वार्षिक खर्च करीब 2,863 रुपये है, जबकि प्राइवेट स्कूलों में यही खर्च बढ़कर 25,002 तक पहुंच जाता है. रिपोर्ट के अनुसार स्कूल फीस के अलावा किताबें, स्टेशनरी, यूनिफॉर्म और परिवहन पर भी परिवारों का बड़ा खर्च होता है. शहरी क्षेत्र में रहने वाले परिवार ग्रामीण इलाकों की तुलना में शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च कर रहे हैं. 

कोचिंग का बढ़ता ट्रेंड बढ़ा रहा खर्च 

आज के समय में स्कूल की पढ़ाई के साथ निजी कोचिंग भी बड़ी जरूर बनती जा रही है. सर्वे के अनुसार चार में से एक से ज्यादा छात्र स्कूल के अलावा अलग से कोचिंग ले रहे हैं. हायर सेकेंडरी स्तर पर शहरी परिवार एक छात्र की कोचिंग पर औसतन 9,950 रुपये सालाना खर्च कर रहे हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह खर्च करीब 4,548 रुपये है. चूंकी अधिकांश छात्र अपनी पढ़ाई के लिए परिवार पर ही निर्भर रहते हैं, इसलिए शिक्षा का बढ़ता खर्च अब सीधे घरेलू बजट को प्रभावित कर रहा है. 

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सिर्फ फीस नहीं कई और खर्च भी जोड़ते हैं बोझ 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि शिक्षा की वास्तविक लागत केवल स्कूल फीस तक सीमित नहीं है. स्कूलों में समय-समय पर विभिन्न गतिविधियों, डेवलपमेंट फीस, स्पोर्ट्स और दूसरे कार्यक्रमों के नाम पर एक्स्ट्रा शुल्क भी देना पड़ता है. इसके अलावा कई परिवार बच्चों की पढ़ाई के लिए लैपटॉप, टैबलेट, इंटरनेट, ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म, प्रोफेशनल कोर्स, स्किल डेवलपमेंट और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर भी लगातार खर्च कर रहे हैं. बदलती तकनीक और रोजगार के नए अवसरों को देखते हुए इन खर्चों को वैकल्पिक नहीं, बल्कि जरूरी माना जा रहा है. 
 
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शिक्षा की महंगाई सामान्य महंगाई से अलग 

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े एक्सपर्ट का कहना है कि कई अभिभावक यह मानकर चलते हैं कि शिक्षा का खर्चा सामान्य महंगाई की दर से ही बढ़ेगा, जबकि वास्तविक स्थिति इससे अलग हो सकती है. उनके अनुसार ट्यूशन फीस के अलावा कोचिंग, हॉस्टल, ट्रांसपोर्ट, डिजिटल उपकरण और प्रोफेशनल कोर्स जैसे खर्च तेजी से बढ़ते हैं. ऐसे में केवल सामान्य महंगाई को आधार पर बनाकर भविष्य की योजना बनाना पर्याप्त नहीं माना जा सकता. उदाहरण के तौर पर अगर किसी प्रोफेशनल कोर्स की वर्तमान लातग 20 लाख रुपये है, तो आने वाले वर्षों में शिक्षा लागत बढ़ने के साथ यही कोर्स से कई गुना महंगा हो सकता है. इसलिए एक्सपर्ट्स अलग-अलग संभावित परिस्थितियों को ध्यान में रखकर वित्तीय योजना बनाने की सलाह देते हैं.

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