कौन थे देश के पहले रक्षा मंत्री, जानें उस समय कितनी मिलती थी सैलरी?


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  • सरदार बलदेव सिंह देश के पहले रक्षा मंत्री बने.
  • उन्होंने स्वतंत्रता और विभाजन की बैठकों में भाग लिया.
  • देश के पहले रक्षा मंत्री के रूप में कार्यभार संभाला.
  • उन्हें प्रतिदिन 45 रुपये का वेतन मिलता था.

आज जब हम देश की सुरक्षा, सेना की ताकत और रक्षा मंत्रालय की बड़ी जिम्मेदारियों की बात करते हैं, तो यह याद करना जरूरी है कि आजादी के बाद इस मंत्रालय की बागडोर सबसे पहले किसने संभाली थी. यह जिम्मेदारी जिस शख्स को मिली, उनका नाम था सरदार बलदेव सिंह. वे न सिर्फ देश के पहले रक्षा मंत्री बने, बल्कि आजादी की लड़ाई और देश के बंटवारे के समय अहम भूमिका निभाने वाले नेताओं में भी शामिल रहे.

सरदार बलदेव सिंह का जन्म 11 जुलाई 1902 को पंजाब के रोपड़ जिले के डुमना गांव में हुआ था. उनका परिवार सम्मानित और संपन्न था. उनके पिता सर इंद्र सिंह एक बड़े उद्योगपति थे. शुरुआती पढ़ाई गांव के पास हुई, फिर अमृतसर के खालसा कॉलेज से शिक्षा पूरी की. पढ़ाई के बाद वे अपने पिता के स्टील उद्योग से जुड़ गए और धीरे-धीरे कंपनी के डायरेक्टर बन गए. व्यापार में सफलता के साथ-साथ उनके मन में देश और समाज के लिए काम करने की भावना भी थी. उन्होंने अपनी शिक्षा खालसा कॉलेज से प्राप्त की थी.

राजनीति में कदम और आजादी की भूमिका

1937 में भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत हुए चुनाव में उन्होंने पंजाब प्रांतीय विधानसभा का चुनाव जीता. वे पंथिक पार्टी के उम्मीदवार थे और बाद में शिरोमणि अकाली दल से भी जुड़े. मास्टर तारा सिंह जैसे बड़े नेताओं के साथ उनकी नजदीकी रही.

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आजादी के दौर में जब देश के भविष्य को लेकर अहम बातचीत चल रही थी, तब सरदार बलदेव सिंह ने पंजाबी सिख समाज का प्रतिनिधित्व किया. आजादी और बंटवारे से जुड़ी बैठकों में उनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही.

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बने देश के पहले रक्षा मंत्री

साल 1947 में देश आजाद हुआ तो नई सरकार बनी. उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सरदार बलदेव सिंह को देश का पहला रक्षा मंत्री चुना. यह जिम्मेदारी आसान नहीं थी. देश नया था, हालात मुश्किल थे और उसी समय भारत-पाकिस्तान के बीच पहला कश्मीर युद्ध भी छिड़ गया. ऐसे समय में रक्षा मंत्रालय की कमान संभालना बड़ी चुनौती थी. लेकिन सरदार बलदेव सिंह ने इसे मजबूती से निभाया.

‘सरदार’ नाम क्यों जुड़ा?

उन्हें अक्सर ‘सरदार’ कहकर पुकारा जाता था. पंजाबी और हिंदी में ‘सरदार’ का मतलब होता है नेता या प्रमुख. उनके व्यक्तित्व और नेतृत्व क्षमता के कारण यह संबोधन उनके नाम के साथ जुड़ गया.

उस दौर में कितनी थी सैलरी?

आज के समय में मंत्री और बड़े पदों पर बैठे लोगों की सैलरी लाखों में होती है. लेकिन आजादी के बाद का दौर बिल्कुल अलग था. देश आर्थिक रूप से मजबूत नहीं था. ऐसे समय में नेताओं ने खुद आगे बढ़कर अपनी सैलरी कम रखने का फैसला किया. सरदार बलदेव सिंह को रक्षा मंत्री के रूप में 45 रुपये प्रतिदिन मिलते थे. यह राशि दो भत्तों को मिलाकर तय की गई थी और खास बात यह थी कि यह इनकम टैक्स से मुक्त थी.

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