Why Nalanda Set On Fire: क्यों लगाई गई थी नालंदा विश्वविद्यालय को आग? हैरान कर देगी इसके पीछे की सच्चाई


Why Nalanda Set On Fire: प्राचीन भारत का नालंदा विश्वविद्यालय सिर्फ एक शिक्षा का केंद्र नहीं था, बल्कि वह पूरी दुनिया के ज्ञान का प्रतीक था. लेकिन एक सनकी आक्रमणकारी की नफरत ने इतिहास के इस सबसे सुनहरे पन्ने को राख में बदल दिया. आइए जानते हैं उस हैरान कर देने वाली सच्चाई को, जिसने दुनिया से ज्ञान का एक अनमोल खजाना हमेशा के लिए छीन लिया.

हकीमों की हार और खिलजी की सनक

यह बात 12वीं सदी के अंत की है. तब के मगध के शासक कुतुबुद्दीन ऐबक का सेनापति बख्तियार खिलजी बेहद बीमार पड़ गया. उसके हकीमों ने रात-दिन एक कर दिए, लेकिन खिलजी की सेहत बिगड़ती ही गई. जब बचने की कोई उम्मीद नहीं बची, तब किसी ने उसे नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र से इलाज कराने की सलाह दी.

खिलजी  गैर-मुस्लिम से इलाज कराने के सख्त खिलाफ था. लेकिन जान बचाने के लिए उसने आचार्य को बुलवाया. खिलजी ने आचार्य के सामने एक अजीब शर्त रखी कि वह उनकी दी हुई कोई भी भारतीय दवा या जड़ी-बूटी नहीं खाएगा.

कुरान के पन्नों का वह चमत्कार

आचार्य राहुल श्रीभद्र ने खिलजी की शर्त मान ली. वे कुछ दिनों बाद खिलजी के पास एक कुरान लेकर पहुंचे. उन्होंने खिलजी से कहा कि उसे कुछ दिनों तक रोज इस कुरान के कुछ पन्ने पढ़ने होंगे. खिलजी ने ऐसा ही किया और देखते ही देखते वह पूरी तरह ठीक हो गया.

दरअसल, आचार्य ने कुरान के पन्नों के कोनों पर एक लेप लगा दिया था. खिलजी जब थूक लगाकर पन्ने पलटता तो वह दवा उसकी जीभ के रास्ते शरीर में चली जाती थी.

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जलन में धधक उठा सनकी सुल्तान

ठीक होने के बाद खिलजी को खुशी नहीं, बल्कि गहरी जलन हुई. उसे इस बात का सदमा लगा कि जो काम उसके महान हकीम नहीं कर पाए, उसे भारतीय वैद्यों ने इतनी आसानी से कर दिया. वह भारतीय ज्ञान और विज्ञान को बर्दाश्त नहीं कर सका.

इसी जलन और नफ़रत की आग में उसने साल 1193 में नालंदा विश्वविद्यालय पर हमला कर दिया. उसने वहां के हजारों निहत्थे बौद्ध भिक्षुओं और आचार्यों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया.

तीन महीने तक जलता रहा ज्ञान का शिखर

खिलजी नालंदा के ज्ञान को जड़ से मिटाना चाहता था. उसने विश्वविद्यालय के विशाल पुस्तकालय धर्मगंज में आग लगवा दी. इस पुस्तकालय में नौ मंजिला इमारतें थीं, जिनमें गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा और दर्शन शास्त्र की 90 लाख से ज्यादा बेशकीमती पांडुलिपियां  मौजूद थीं.

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