UP 69 हजार शिक्षक भर्ती विवाद, जानें वर्टिकल और हॉरिजॉन्टल आरक्षण में अंतर


UP Teacher Recruitment: आज उत्तर प्रदेश में 69 हजार शिक्षकों की भर्ती से संबंधित एक जरूरी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होनी है. उत्तर प्रदेश सरकार और याचिकार्ताओं की ओर से पांच-पांच वकील अपने-अपने पक्ष सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रस्तुत करेंगे. उत्तर प्रदेश में आरक्षण प्रक्रिया से बाहर किए गए 67 हजार से ज्यादा शिक्षकों और लगभग 9,000 उम्मीदवारों का भविष्य इसी फैसले पर निर्भर करता है. वहीं सोमवार को दोनों पक्षों ने अदालत में हालफनामे दाखिल किए और अपने जवाब प्रस्तुत किए. हलफनामे में यूपी सरकार ने स्पष्ट किया कि 2020 में चयनित हुए 69,867 चयनित शिक्षकों में से किसी को हटाने के पक्ष में नहीं है.

यूपी सरकार के अनुसार आपत्ति करने वाले छात्रों में से जो योग्य होंगे, उन्हें आने वाली भर्तियों में प्राथमिकता दी जाएगी. वहीं उत्तर प्रदेश में इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा वर्टिकल और हॉरिजॉन्टल आरक्षण को लेकर हैं. यही दो शब्द इस भर्ती विवाद की जड़ माने जा रहे हैं. ऐसे में चलिए आज हम आपको समझाते हैं कि वर्टिकल और हॉरिजॉन्टल दोनों आरक्षण प्रणालियों में क्या अंतर है और 69 हजार शिक्षक भर्ती में विवाद कैसे पैदा हुआ. 

कैसे शुरू हुआ 69 हजार शिक्षक भर्ती विवाद? 

उत्तर प्रदेश सरकार ने दिसंबर 2018 में बेसिक शिक्षा परिषद के प्राथमिक विद्यालय में 69 हजार सहायक अध्यापकों की भर्ती निकाली थी. जनवरी 2019 में परीक्षा हुई और उसके बाद सामान्य वर्ग के लिए 65 प्रतिशत तथा आरक्षित वर्ग के लिए 60 प्रतिशत कट ऑफ तय किया गया. भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद सदस्य 67,867 अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी गई. हालांकि चयन सूची जारी होने के बाद आरक्षित वर्ग के कई अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया की भर्ती में आरक्षण के नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया. उनका कहना था की मेरिट में आने वाले आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को सामान्य श्रेणी में समायोजित करने के बजाय उनके आरक्षित कोटे में ही गिना गया. जिससे इस वर्ग के दूसरे उम्मीदवारों को अवसर नहीं मिल सका. यही विवाद बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया. 

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क्या होता है? वर्टिकल आरक्षण?

वर्टिकल आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए दिया जाता है. इसके तहत अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग  (EWS) के लिए अलग-अलग आरक्षण तय होता है. इस व्यवस्था का सबसे जरूरी नियम यह है कि अगर किसी आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार अपनी मेरिट के आधार पर जनरल सीट हासिल कर लेता है, तो उसे उसके आरक्षित कोटे में नहीं गिना जाता. यानी उसकी आरक्षित सीट खाली रहती है, जिस पर इस वर्ग के किसी अन्य पात्र उम्मीदवार को नियुक्ति मिल सकती है. इसे मेरिट आधारित माइग्रेशन कहा जाता है. 69 हजार शिक्षक भर्ती में विवाद का मुख्य कारण भी यही बताया गया कि मेरिट में चयनित कई आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को सामान्य सीटों पर समायोजित नहीं किया गया. 

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हॉरिजॉन्टल आरक्षण क्या है?

हॉरिजॉन्टल आरक्षण विशेष वर्गों को अतिरिक्त अवसर देने की व्यवस्था है. इसमें महिला, पीडब्ल्यूडी कैटेगरी, एक्स सर्विसमैन जैसी कैटेगरी शामिल होती है. यह आरक्षण अलग से नहीं चलता, बल्कि हर वर्टिकल श्रेणी के अंदर लागू होता है. उदाहरण के लिए अगर किसी वर्ग में महिलाओं के लिए आरक्षण तय है, तो पहले उस वर्ग की पूरी मेरिट लिस्ट तैयार की जाती है. इसके बाद देखा जाता है कि उसमें कितनी महिलाएं चयनित हुई है. अगर निर्धारित संख्या पूरी नहीं होती तभी सूची में आवश्यक बदलाव कर महिला अभ्यर्थियों को शामिल किया जाता है. यानी हॉरिजॉन्टल  आरक्षण किसी वर्ग का अलग कोटा नहीं बढ़ाता, बल्कि इस कैटेगरी के अंदर समायोजित किया जाता है. 

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दोनों आरक्षण में सबसे बड़ा अंतर 

वर्टिकल आरक्षण सामाजिक वर्गों के लिए होता है, जबकि हॉरिजॉन्टल आरक्षण विशेष कैटेगरी के लिए लागू किया जाता है. वर्टिकल आरक्षण में अगर कोई एससी, एसटी, ओबीसी या ईडब्ल्यूएस उम्मीदवार सामान्य मेरिट से चयनित होता है, तो उसकी सीट आरक्षित कोटे से कम नहीं होती. दूसरी और हॉरिजॉन्टल आरक्षण में मेरिट से चयनित महिला या दिव्यांग उम्मीदवार इस हॉरिजॉन्टल कोटे का हिस्सा मानी जाती है और उसके लिए अतिरिक्त सीट नहीं जोड़ी जाती. इसी कारण दोनों आरक्षण की गणना और लागू करने का तरीका पूरी तरह अलग होता है.

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