Doctors Long Shifts Pain | FAIMA Report 2026


43 मिनट पहले

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हाल ही में फेडरेशन ऑफ इंडिया मेडिकल एसोसिएशन का एक ऐसा सर्वे सामाने आया है जो डॉक्टरों की लंबी शिफ्ट और काम के बीच डॉक्टर्स के दर्द को बयां करता है। 1,260 रेजिडेंट डॉक्टरों के ऑनलाइन सर्वे में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।

देश के 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 1,260 रेजिडेंट डॉक्टरों ने इस गुमनाम ऑनलाइन सर्वे में भाग लिया। सर्वे के नतीजे चिंताजनक रहे। लगभग 87.5% प्रतिभागियों ने माना कि उन्हें अक्सर या कभी-कभी बर्नआउट के लक्षण महसूस होते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, कई युवा डॉक्टरों को 24 से 36 घंटे तक लगातार ड्यूटी करनी पड़ती है। इस दौरान उन्हें ठीक से बैठकर खाना खाने या थोड़ी देर आराम करने का भी मौका नहीं मिलता। नींद पूरी न होने और लगातार काम करने का सीधा असर उनके शरीर और दिमागी हालत पर पड़ रहा है।

FAIMA ने अपने बयान में खुले तौर पर कहा है कि काम का यह जानलेवा बोझ अब डॉक्टरों के लिए एक भयानक हकीकत बन चुका है, जिसे सिस्टम नजरअंदाज कर रहा है।

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This survey was conducted by #FAIMA among resident doctors across India as part of the FAIMA Resident Mental Health Survey (RMS) 2.0, following the successful FAIMA RMS 1.0, which saw participation from nearly 2,000 resident doctors.A total of 1,260 resident doctors… pic.twitter.com/53VxGnRQs2— FAIMA Doctors Association (@FAIMA_INDIA_) June 27, 2026

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मेडिकल स्टूडेंट की परेशानी भी कम नहीं ये परेशानी सिर्फ अस्पतालों तक ही सीमित नहीं है। जो छात्र डॉक्टर बनने का सपना लिए कोचिंग सेंटरों में जा रहे हैं, उनकी हालत भी कुछ कम खराब नहीं है। मेडिकल की तैयारी कराने वाले कई बड़े कोचिंग सेंटरों में सुरक्षा के मानकों की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

रिपोर्ट ने इस बात पर जोर दिया है कि कई कोचिंग सेंटर तंग बेसमेंट में चल रहे हैं, जहां न तो आग लगने पर बाहर निकलने का कोई सुरक्षित रास्ता है और न ही हवा आने-जाने का सही इंतजाम। लाखों रुपये की भारी-भरकम फीस वसूलने के बावजूद छात्रों को ऐसी खतरनाक और घुटन भरी जगहों पर घंटों बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है।

संगठन ने शिक्षा मंत्रालय से सख्त अपील की है कि वे तुरंत इस मामले में दखल दें और छात्रों की जिंदगी से हो रहे इस खिलवाड़ को रोकें।

FMG काउंसलिंग ने बढ़ाया तनाव

रेजीडेंट डॉक्टरों और छात्रों की परेशानी यहीं खत्म नहीं होती। सिस्टम की लेटलतीफी उनका करियर और दिमागी सुकून दोनों खराब कर रही है। फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट्स (FMG) की इंटर्नशिप में होने वाली देरी पूरे हेल्थकेयर सिस्टम पर बुरा असर डाल रही है।

समय पर ट्रेनिंग न मिलने से युवा डॉक्टरों का भविष्य अधर में लटक जाता है। सुपर स्पेशियलिटी (NEET SS) काउंसलिंग में हो रही बेवजह की देरी ने युवा डॉक्टरों के बीच मानसिक तनाव काफी बढ़ा दिया है। अनिश्चितता, नींद की कमी और काम का भारी बोझ डॉक्टरों के वर्क-लाइफ बैलेंस को पूरी तरह से तबाह कर चुका है, जिससे उनमें डिप्रेशन और एंग्जाइटी तेजी से बढ़ रही है।

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प्रशासनिक काम को बढ़ता बोझ

सर्वे में हिस्सा लेने वाले डॉक्टरों ने अस्पतालों में स्टाफ की भारी किल्लत भी बताई। जरूरत के हिसाब से डॉक्टर और नर्स मौजूद न होने की वजह से मौजूद रेजीडेंट डॉक्टरों पर काम का बोझ दोगुना-तिगुना हो जाता है।

हैरानी की बात यह है कि इन डॉक्टरों को सिर्फ मरीजों का इलाज ही नहीं करना होता, बल्कि कई ऐसे प्रशासनिक काम भी करने पड़ते हैं जिनका इलाज से कोई सीधा लेना-देना नहीं होता।

सिर्फ डॉक्टर नहीं, मरीज भी हैं खतरे में

इस रिपोर्ट के मुताबिक, इस सब में डॉक्टर सिर्फ अपनी सेहत नहीं खोता, बल्कि इससे मरीजों की सुरक्षा भी दांव पर लग जाती है। अगर लगातार कई घंटों से जाग रहा डॉक्टर इलाज कर रहा है, तो गलती की आशंका बढ़ सकती है।

संगठन का मानना है कि यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए तो इसका सीधा असर देश की स्वास्थ्य सेवाओं और मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ सकता है।

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