CBSE OSM Controversy: सॉफ्टवेयर क्रैश, ब्लर कॉपियां और भारी बैकलॉग’, स्कैनिंग करने वाले टेक्निशियन का बड़ा खुलासा


CBSE की 12वीं बोर्ड परीक्षा में लागू की गई ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली पर उठ रहे सवालों के बीच बड़ा खुलासा सामने आया है. आंसर शीट स्कैन करने वाले एक टेक्निशियन ने एबीपी न्यूज की रिपोर्टर से फोन पर हुई बातचीत में कई चौंकाने वाले दावे किए. बता दें कि एबीपी न्यूज की रिपोर्टर ने 12वीं की छात्रा बनकर बात की थी. इस बातचीत ने स्कैनिंग प्रक्रिया, सॉफ्टवेयर की गुणवत्ता और कॉपियों के मूल्यांकन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

सॉफ्टवेयर और सिस्टम की बदहाली

टेक्निशियन ने स्कैनिंग के लिए इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर को बेहद निचले स्तर का बताया. 

  • बेसिक सॉफ्टवेयर: सिस्टम में ऑप्टिमाइजेशन की भारी कमी थी. टेक्निशियन के मुताबिक, इसे कोई बच्चा भी बना सकता था. सॉफ्टवेयर अक्सर क्रैश और लैग करता था.
  • डेटा डिलीट होने का डर: यदि पूरी कॉपी स्कैन होने के बाद अपलोड नहीं हो पाती थी तो पुराना डेटा डिलीट हो जाता था और पूरी कॉपी दोबारा स्कैन करनी पड़ती थी.
  • खराब हार्डवेयर: स्कैनिंग के लिए एक फ्रेम पर फिट किए गए लॉजिटेक (Logitech) वेबकैम का इस्तेमाल होता था. कई सिस्टम्स लो-प्रोसेसर वाले थे. एक पेपर कुछ KB में सेव होता था, फिर भी सिस्टम हैंग होते थे.

कौन कर रहा था कॉपियों की स्कैनिंग?

जिन हाथों में छात्रों की आंसर शीट्स अपलोड करने की जिम्मेदारी थी, वे प्रोफेशनल नहीं थे.

  • फ्रीलांसर और छात्र: स्कैनिंग करने वाले ज्यादातर लोग पार्ट-टाइम काम करने वाले अंडरग्रेजुएट छात्र थे, जो AI, BCA, BTech या B.Com की पढ़ाई कर रहे थे.
  • पढ़ने से कोई मतलब नहीं: टेक्निशियन ने स्पष्ट कहा, ‘हमें बस स्कैन करना होता है, कॉपियां पढ़नी थोड़ी होती हैं.’
  • कम भुगतान और लंबी शिफ्ट: प्रति कॉपी मात्र 2 रुपये दिए जाते थे, जिसका भुगतान अभी तक नहीं हुआ है. शिफ्ट सुबह 9 से शाम 6 और फिर रात 8 से 11 बजे तक बिना छुट्टी के चलती थी. एक व्यक्ति ओवरटाइम करके रोजाना 700 तक कॉपियां स्कैन कर पाता था.
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बैकलॉग और कॉपियों के गायब होने की आशंका

  • लगातार बढ़ता बैकलॉग: टेक्निशियन के अनुसार, लगातार पेपर आने से बैकलॉग बढ़ता जा रहा था. उसने आशंका जताई कि शायद कुछ छात्रों की कॉपियां स्कैनिंग तक पहुंच ही न पाई हों.
  • पेंडिंग बंडल की समस्या: एक बंडल में 60 से 100 कॉपियां होती थीं. यदि एक भी आंसर शीट में दिक्कत जैसे पन्ना फटना या चीटिंग की पर्ची मिलना होती थी तो पूरा बंडल पेंडिंग में डाल दिया जाता था. ऐसी कॉपियां बाद में मैनुअल चेकिंग के लिए जाती थीं.
  • परीक्षा के बाद भी काम: 10 अप्रैल को परीक्षा खत्म होने के बाद भी 12 अप्रैल तक सेंटर पर काम चला. एक सेंटर पर करीब 35 हजार पेपर आए थे, जिनमें से 10 हजार बैकलॉग में चले गए थे.

क्वालिटी चेक में बड़ी लापरवाही

  • ब्लर कॉपियां हुईं पास: क्वालिटी चेक प्रक्रिया में खामियों के चलते कई धुंधली (Blur) कॉपियां भी चेकिंग के लिए आगे भेज दी गईं.
  • ऑटोमैटिक रिजेक्शन: सॉफ्टवेयर की दिक्कत के कारण कई कॉपियां सिस्टम द्वारा खुद ही रिजेक्ट हो गईं और वे चेकिंग के लिए आगे जा ही नहीं सकीं. एक बैच की स्कैनिंग में करीब 15 मिनट लगते थे, जिसके बाद वह क्वालिटी चेक में जाता था.

निगरानी और सुरक्षा तंत्र नदारद

टेक्निशियन ने दावा किया कि सेंटर पर कोई पुलिस या आधिकारिक निरीक्षण नहीं होता था.

  • अधिकारियों की गैरमौजूदगी: सेंटर पर न तो पुलिस आती थी और न ही CBSE का कोई अधिकारी निरीक्षण के लिए पहुंचता था.
  • कॉपियों का रूट: सेंटर पर सीसीटीवी कैमरे लगे थे और केवल अधिकृत लोगों को प्रवेश मिलता था. स्कैन होने के बाद रात में सर्वर के जरिए कॉपियां सीधे CBSE को चेकिंग के लिए भेजी जाती थीं.
  • छोटे सेंटर्स का इस्तेमाल: टियर-1 शहरों के आसपास के छोटे गांवों और सरकारी कॉलेजों को स्कैनिंग सेंटर बनाया गया था, जहां यह पता नहीं था कि कौन सी कंपनी यह काम करवा रही है.
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यह खुलासा CBSE के उस दावे पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है, जिसमें OSM सिस्टम को पारदर्शी और मूल्यांकन में एकरूपता लाने वाला बताया गया.

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