मेडिकल सेक्टर में हिंदी का हाल कैसा, देश के पहले हिंदी मॉडल का क्या हुआ?


हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है. इसी दिन 1949 में संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा के तौर पर स्वीकार किया था. हालांकि हिंदी को लेकर संविधान सभा में करीब 3 साल तक बहस चली और अंग्रेजी को भी सरकारी कामकाज में जारी रखने की व्यवस्था बनाई गई. वहीं आज हिंदी के प्रचार प्रसार की चर्चा के बीच मध्य प्रदेश में मेडिकल शिक्षा को हिंदी में बढ़ावा देने के लिए शुरू किए गए देश के पहले बड़े प्रयोग की स्थिति सवाल खड़े कर रही है.

मध्य प्रदेश में एमबीबीएस की पढ़ाई को हिंदी में शुरू करने का मॉडल बनाया गया था, लेकिन आज इस मॉडल की हालत बिलकुल अलग है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि मेडिकल सेक्टर में हिंदी का कैसा हाल है और देश के पहले हिंदी मॉडल का क्या हुआ. 

मेडिकल सेक्टर में देश का पहला हिंदी मॉडल 

मध्य प्रदेश में करीब 3 साल पहले अंग्रेजी के ऑप्शन के तौर पर हिंदी में एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू की गई. इसे मेडिकल शिक्षा में भाषा को लेकर एक बड़े मॉडल के तौर पर देखा गया. सरकार ने इस व्यवस्था को तैयार करने में करीब 10 करोड़ रुपये खर्च किए और 50 हजार हिंदी मेडिकल किताबें छपवाई. इसके अलावा मेडिकल कॉलेज में मंंदार केंद्र बनाए गए, जहां डॉक्टरों की टीम ने मेडिकल विषयों की किताबों का हिंदी में अनुवाद किया. लेकिन इस बार अब इस प्रयोग को लेकर सामने आई स्थिति बताती है कि किताबें और व्यवस्था तैयार होने के बावजूद छात्रों में हिंदी माध्यम को लेकर भरोसा नहीं बन सका है. 

See also  NVS Lucknow contractual teacher recruitment 2026 application window closes today for PGT TGT posts; apply here

3 साल में किसी ने भी नहीं दी हिंदी परीक्षा 

एमबीबीएस के 16 विषयों की 16 किताबों का हिंदी में अनुवाद 300 से ज्यादा डॉक्टरों की टीम ने किया. किताबों के अनुवाद पर करीब 2 करोड़, प्रिंटिंग पर 5.5 करोड़ मंदार केंद्रों पर लगभग 3 करोड़ रुपये खर्च किए गए. वहीं शुरुआत में स्टूडेंट्स की संख्या के हिसाब से किताबें छापी जाती थी. जबकि अब नए संस्करण आने पर कॉलेजों को उनकी मांग के अनुसार करीब 25 से 30 फीसदी प्रतियां ही उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है. लेकिन इस पूरे प्रयोग की सबसे बड़ी समस्या छात्रों की परीक्षा से जुड़ी है.  द्विभाषी प्रश्न पत्र उपलब्ध होने के बावजूद पिछले तीन साल में एक भी विद्यार्थी ने हिंदी में उत्तर लिखकर नहीं परीक्षा नहीं दी. छात्रों के बीच की अवधारणा बनी है कि हिंदी में जवाब लिखने पर का कम या जीरो अंक मिल सकते है,  जो इसकी बड़ी वजह माना जा रहा है. 

कई मंंदार केंद्रों पर ताले, किताबें भी उपयोग से दूर 

हिंदी में मेडिकल शिक्षा के लिए बनाए गए मांदर केंद्रों की स्थिति भी एक जैसी नहीं है. भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज में बने केंद्र पर ताला लगा होने और हिंदी की किताबें स्टोर में रखे होने की जानकारी भी सामने आई है. इंदौर मेडिकल कॉलेज में भी बड़ी संख्या में किताबों के इस्तेमाल के बजाय डिब्बों में बंद रहने की बात सामने आई है. वहीं रतलाम में तस्वीर कुछ अलग है, वहां डीप डॉ. डॉक्टर अनीता मूथा की ओर से हर साल पुस्तक मेला आयोजित किए जाने के कारण करीब 80 फीसदी हिंदी किताबें विद्यार्थियों तक पहुंच चुकी है. 

See also  Rajasthan Police SI Result 2026 declared; candidates shortlisted for PET stage

शुरुआती उत्साह के बाद थम गया काम 

हिंदी माध्यम में एमबीबीएस शुरू होने के बाद शुरुआत में मुख्यमंत्री और मंत्री स्तर पर 50 से ज्यादा समीक्षा बैठक के हुई थी. छात्रों से संवाद किया गया और मंदार की टोली से जुड़े लोगों को भी सम्मानित किया गया, लेकिन अब पिछले एक करीब एक साल से कार्य समिति की बैठक नहीं हुई है. शिक्षकों के प्रशिक्षण और क्लीनिकल रिकॉर्ड तैयार करने का काम भी आगे नहीं बढ़ पाया. हिंदी के प्रकोष्ठ के लिए अलग बजट की कमी भी सामने आई है. 

ये भी पढ़ें-IGNOU में शुरू होने वाली है मेगा प्लेसमेंट ड्राइव, आ रहीं ये कंपनियां

एनएमसी ने मांगी रिपोर्ट 

यह मामला अब एनएमसी तक भी पहुंच गया है. आयोग ने मध्य प्रदेश से हिंदी माध्यम एमबीबीएस प्रयोग से जुड़ी पूरी जानकारी मांगी है. इसमें हिंदी के सैंपल प्रश्न पत्र, सैंपल उत्तर पुस्तिकाएं और अलग-अलग प्रश्नों में हिंदी माध्यम चलन वाले विद्यार्थियों का प्रतिशत समेत दूसरे आंकड़े शामिल है. 

इंजीनियरिंग में भी हिंदी माध्यम की तस्वीर साफ नहीं 

मध्य प्रदेश में हिंदी में तकनीकी शिक्षा की स्थिति भी बहुत मजबूत नहीं दिखाई देती है. राजीव गांधी प्रौद्योगिकी  यूनिवर्सिटी में हिंदी में बीटेक के लिए एआईसीटीई से मान्यता लेने की पहल नहीं की है, जबकि एआईसीटीई ई-कुंभ पोर्टल पर बीटेक प्रथम और द्वितीय वर्ष की हिंदी किताबें उपलब्ध है और उनके अनुवाद की नोडल एजेंसी आरजीपीवी ही रही है. वर्तमान में यूनिवर्सिटी में परीक्षा के प्रश्न पत्र द्विभाषी दिए जाते हैं, लेकिन हिंदी माध्यम से पूरी पढ़ाई की व्यवस्था नहीं है. हालांकि कुलगुरु प्रो. आलोक शर्मा ने हिंदी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए एआईसीटीई से अतिरिक्त सीटें और अनुमति लेने के प्रयास की बात कही है.

See also  DSSSB Recruitment 2026: 2009 के अभ्यर्थियों को दूसरा मौका, 606 ASO पदों पर फिर से आवेदन शुरू

ये भी पढ़ें-यश डबास Vs विजय शंकर मीणा… DUSU चुनाव में आमने-सामने ABVP-NSUI कैंडिडेट, देखें प्रोफाइल

Education Loan Information:
Calculate Education Loan EMI



Source link

Leave A Comment

All fields marked with an asterisk (*) are required