Students are becoming weak in basic mathematics and intensive reading


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न्यूयॉर्क56 मिनट पहले

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स्टडी के मुताबिक, हाई-स्कूल स्तर से भी कम गणितीय समझ वाले छात्रों की संख्या पांच साल में तीस गुना बढ़ गई है।- प्रतीकात्मक फोटो

दुनिया की शीर्ष यूनिवर्सिटी के छात्र बुनियादी गणित और रीडिंग में भी पिछड़ रहे हैं, कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के 1800 प्रोफेसर्स ने खुली चिट्ठी लिखकर चेतावनी दी है कि नए अंडरग्रेजुएट छात्र मिडिल-स्कूल स्तर (कक्षा 6-8) का गणित भी नहीं जानते। उन्हें ये गणित दोबारा पढ़ाना पड़ रहा है।

वहीं, सैन डिएगो की स्टडी के मुताबिक, हाई-स्कूल स्तर से भी कम गणितीय समझ वाले छात्रों की संख्या पांच साल में तीस गुना बढ़ गई है। हार्वर्ड जैसे संस्थान को पाठ्यक्रम छोटा करना पड़ रहा है, क्योंकि छात्र जटिल वाक्यों पर फोकस नहीं कर पा रहे हैं। इस गिरावट की प्रमुख वजहें क्या हैं, जानिए…

सोशल मीडिया से घटा अटेंशन स्पैन

स्मार्टफोन व सोशल मीडिया ने अटेंशन स्पैन घटा दिया है। ओईसीडी के अनुसार, छात्र लंबे व जटिल टेक्स्ट नहीं पढ़ रहे। अमेरिका में 1990 के दशक में 60% बच्चे शौक से किताबें पढ़ते थे, अब 37% रह गए। छात्र सतही तौर पर स्कैन करते हैं, जिससे भाषा को गहराई से समझने की क्षमता कमजोर हुई।

अनिवार्य असेसमेंट– कोल्ड कॉलिंग से नियंत्रण संभव: बर्कले की प्रो. मीना अगानागिक कहती हैं,‘अनिवार्य असेसमेंट व क्लासरूम में अचानक छात्रों से सवाल पूछना, सरप्राइज पेन-पेपर टेस्ट लागू करके समस्या दूर कर सकते हैं। ग्रेड इन्फ्लेशन व एआई से नकल रोकने के लिए एडमिशन में योग्यता जांचना व क्लासरूम में गैजेट्स पर पाबंदी जरूरी है। कड़े मापदंड व सख्त ग्रेडिंग से ही बिना तैयारी के आने वाले छात्रों को रोक सकेंगे।

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नींव कमजोर – कॉलेजों को यह समस्या स्कूलों से विरासत में मिली है। विशेषज्ञ जेसिका हूटन विल्सन के अनुसार, कोरोना में स्कूल बंद होने से छात्रों का नुकसान हुआ। कई छात्र कॉलेज तक पहुंच गए, पर उनकी बुनियादी समझ इतनी कमजोर है कि मानो वे कभी हाई स्कूल गए ही नहीं। PISA व NAEP के आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा का स्तर महामारी से पहले ही गिरना शुरू हो गया था। शिक्षा सुधारों में ठोस तथ्य व बुनियादी सिलेबस हटाकर सॉफ्ट स्किल्स पर जोर देने से नींव कमजोर हो गई।

परखना चुनौतीपूर्ण – महामारी के बाद अमेरिका के 90% से अधिक कॉलेजों ने एसएटी जैसे मानक टेस्ट को वैकल्पिक या बंद कर दिया। स्कूलों में बच्चों को खुश करने के लिए आसानी से नंबर दिए जाते हैं। नतीजतन, हाई स्कूल में ‘परफेक्ट स्कोर’ पाने वाले भी कॉलेज पहुंचकर बुनियादी गणित और भाषा में विफल हो जाते हैं। यूनिवर्सिटी के पास यह परखने का तरीका नहीं बचा कि आने वाला छात्र योग्य है या नहीं।

शॉर्टकट कल्चर – ब्रिटेन के थिंक-टैंक एचईपीआई और बर्कले की स्टडी के अनुसार 94% छात्र एआई की मदद ले रहे हैं और पढ़े बिना पास हो रहे हैं। प्रोफेसर्स पर भी अच्छे नंबर देने का दबाव रहता है ताकि खराब फीडबैक से बच सकें। जब बिना मेहनत ही एआई से ‘ए’ ग्रेड मिल रहा है, तो छात्रों में सीखने की प्रेरणा लगभग खत्म हो चुकी है।



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