JNU Controversy | Umar Khalid Book Event Cancelled & Campus Protest


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11 मिनट पहले

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जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में 10 अगस्त 2026 को उमर खालिद की किताब फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज : आदिवासी हिस्ट्रीज एंड द पॉलिटिक्स ऑफ पावर पर चर्चा के लिए कार्यक्रम रखा गया था। कार्यक्रम का आयोजन जेएनयू स्टूडेंट्स यूनियन से जुड़े छात्रों ने किया। इसमें कई शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं बुलाया गया।

आखिरी वक्त पर जेएनयू प्रशासन ने कार्यक्रम के लिए बुक किए गए SSS-1 ऑडिटोरियम की बुकिंग रद्द कर दी। प्रशासन का कहना था कि कार्यक्रम की पूरी जानकारी विश्वविद्यालय को नहीं दी गई और कुछ फैक्ट्स छिपाए गए।

दूसरे कैंपस में हुई चर्चा

ऑडिटोरियम नहीं मिलने के बावजूद छात्र पीछे नहीं हटे। उन्होंने कैंपस में दूसरे स्थान पर चर्चा आयोजित करने का फैसला किया। बड़ी संख्या में छात्र वहां पहुंचे। JNUSU का कहना था कि किसी सभागार की बुकिंग रद्द होने से छात्रों के बीच होने वाली चर्चा और बातचीत को नहीं रोका जा सकता। इसके बाद छात्रसंघ ने कार्यक्रम के लिए दूसरी जगह चुनी। 10 अगस्त को दोपहर करीब 3 बजे SSS-2 भवन के बाहर चर्चा शुरू की गई।

JNU ने अपने पक्ष में कहा कि प्रशासन के अनुसार, कार्यक्रम की अनुमति देने और उसे रद्द करने की कार्रवाई दोनों SSS के डीन की ओर से की गई। डीन की ओर से SSS के प्रोफेसर अविनाश कुमार को भी लेटर भेजकर कार्यक्रम रद्द किए जाने की जानकारी दी गई थी।

विरोध करने वाले छात्रों ने नारे लगाए

SSS-2 ऑडिटोरियम में चर्चा के दौरान नारेबाजी और विरोध हुआ जिससे कार्यक्रम कुछ समय के लिए रोकना पड़ा। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, एक तरफ कार्यक्रम समर्थक छात्र मौजूद थे, वहीं दूसरी तरफ विरोध करने वाले छात्र भी नारे लगा रहे थे।

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कार्यक्रम में दिखी भारी भीड़

इस कार्यक्रम का आयोजन JNU छात्रसंघ (JNUSU) की ओर से किया गया। छात्रसंघ के मुताबिक यह चर्चा अंतरराष्ट्रीय विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर रखी गई।

SSS – 2 ऑडिटोरियम में वक्ताओं के लिए कुर्सियों की व्यवस्था की गई। कार्यक्रम स्थल के बाहर उमर खालिद की किताब का स्टॉल भी लगाया गया। चर्चा में किताब के विषय, आदिवासी इतिहास और सत्ता के सवालों पर बात शुरू हुई।

यह विवाद इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि उमर खालिद जेएनयू के पूर्व छात्र हैं और 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में आरोपी हैं। वे फिलहाल जेल में हैं।

उमर खालिद की यह किताब पीएचडी थीसिस पर आधारित है। इसमें झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र के आदिवासी समाज, उनके इतिहास और उस दौर में सत्ता-संबंधों का जिक्र किया गया है।

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