कौन थी देश की पहली महिला IFS अफसर, जानें उस समय कितनी मिलती थी तनख्वाह?


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  • सी.बी. मुत्तम्मा भारत की पहली महिला थीं जिन्होंने IFS जॉइन की.
  • मुश्किल हालात में शिक्षा पाई, मद्रास से तीन गोल्ड मेडल जीते.
  • शादी पर नौकरी छोड़ने की शर्त पर किया काम, फिर आवाज उठाई.
  • पेरिस, रंगून, लंदन और हंगरी में भारत का प्रतिनिधित्व किया.

आज जब लड़कियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, तो यह रास्ता यूं ही आसान नहीं बना. इसके पीछे कुछ ऐसी महिलाओं की कहानियां हैं, जिन्होंने उस समय दीवारें तोड़ीं, जब महिलाओं के लिए बड़े सरकारी पदों तक पहुंचना लगभग नामुमकिन माना जाता था. ऐसी ही एक नाम है सी.बी. मुत्तम्मा. वे भारत की पहली महिला थीं जिन्होंने सिविल सेवा परीक्षा पास की और पहली महिला बनीं जिन्होंने भारतीय विदेश सेवा (IFS) जॉइन की.

सी.बी. मुत्तम्मा का जन्म 24 जनवरी 1924 को कर्नाटक के वीराजपेट (कूर्ग) में हुआ. उनके पिता वन विभाग में अधिकारी थे, लेकिन जब मुत्तम्मा सिर्फ नौ साल की थीं, तब उनके पिता का निधन हो गया. परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां पर आ गई. मुश्किल हालात के बावजूद उनकी मां ने अपने बच्चों की पढ़ाई पर कभी समझौता नहीं किया.

मुत्तम्मा ने मदिकेरी के सेंट जोसेफ गर्ल्स स्कूल से पढ़ाई की. आगे चलकर उन्होंने चेन्नई के वुमेन्स क्रिश्चियन कॉलेज से ग्रेजुएशन किया, जहां उन्हें तीन गोल्ड मेडल मिले. इसके बाद उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया.

कब पास की परीक्षा?

साल 1948 में उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा दी. उस समय बहुत कम महिलाएं इस परीक्षा में बैठती थीं. लेकिन मुत्तम्मा ने न केवल परीक्षा पास की, बल्कि शानदार रैंक भी हासिल की. 1949 में उन्होंने भारतीय विदेश सेवा जॉइन की और इतिहास रच दिया. वे भारत की पहली महिला बनीं जिन्होंने IFS में कदम रखा.

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शादी पर नौकरी छोड़ने की शर्त

आज यह सुनकर अजीब लगता है, लेकिन उस समय मुत्तम्मा से एक कागज पर हस्ताक्षर करवाए गए. उस कागज में लिखा था कि शादी होने के बाद उन्हें नौकरी छोड़नी होगी. यह उस दौर की सोच को दिखाता है. लेकिन मुत्तम्मा ने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. आगे चलकर उन्होंने इसी भेदभाव के खिलाफ आवाज भी उठाई.

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कहां हुई पहली पोस्टिंग?

IFS जॉइन करने के बाद उनकी पहली पोस्टिंग पेरिस में भारतीय दूतावास में हुई. इसके बाद उन्होंने रंगून, लंदन और दिल्ली में विदेश मंत्रालय के अलग-अलग विभागों में काम किया. वे एशिया, यूरोप और अफ्रीका के कई देशों में भारत का प्रतिनिधित्व करती रहीं.

कितनी मिलती थी तनख्वाह?

1950 के शुरुआती दौर में IFS के एक अफसर को लगभग 350 रुपये प्रति माह सैलरी मिलती थी. इसके साथ करीब 90 रुपये का भत्ता दिया जाता था. साल 1970 में उन्हें हंगरी में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया. यह एक और ऐतिहासिक पल था. वे भारतीय विदेश सेवा के अंदर से राजदूत बनने वाली पहली महिला थीं. बाद में उन्होंने घाना के अक्रा में हाई कमिश्नर और नीदरलैंड्स के हेग में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया.

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