RPSC Clerk Recruitment Cheating | Job Secured at Rank 17


राजस्थान लोक सेवा आयोग ने कनिष्ठ सहायक/लिपिक ग्रेड-।। संयुक्त सीधी भर्ती परीक्षा-2018 में नकल के जरिए चयनित हुई लिपिक ग्रेड-I सरोज बिश्नोई को राजकीय सेवा से बर्खास्त कर दिया है।

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लगभग 6 वर्ष की सेवा अवधि पूर्ण कर चुकी इस कार्मिक को परीक्षा पास करने के लिए अनुचित साधनों के प्रयोग करने के कृत्य को राजस्थान सिविल सेवा आचरण नियम का उल्लंघन मानते हुए ये कार्रवाई की गई है।

​आयोग द्वारा राजस्थान सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1971 को इस कार्रवाई का आधार बनाया गया है। आदेश के अनुसार सरोज बिश्नोई में एक सरकारी कर्मचारी के रूप में सत्यनिष्ठा का अभाव एवं अनैतिक रूप से जीवन जीना पाया , जो सेवा नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है। ​नियम 3 के अंतर्गत प्रत्येक शासकीय सेवक को हर समय उच्च स्तर की सत्यनिष्ठा,कर्तव्यपरायणता बनाए रखनी होती है। सरोज बिश्नोई का कृत्य सर्वथा अशोभनीय पाया गया।

​अनुचित लाभ और ब्लूटूथ का इस्तेमाल

जांच में प्रमाणित हुआ कि सरोज बिश्नोई ने परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए ब्लूटूथ डिवाइस जैसे अनुचित साधनों का सहारा लिया और इसके एवज में मुख्य आरोपी पौरव कालेर को अपने हस्ताक्षरशुदा चेक सौंपे, जो गंभीर कदाचार और भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।

​आयोग की सूचना पर हुआ था खुलासा

सरोज बिश्नोई का चयन कर्मचारी चयन बोर्ड द्वारा आयोजित वर्ष 2018 की लिपिक भर्ती परीक्षा में ओबीसी वर्ग की मेरिट सूची में 17वें स्थान पर हुआ था, जिसके बाद उसने मार्च 2020 में आयोग में कार्यग्रहण किया था। तत्पश्चात गोपनीय सूत्रों से प्राप्त प्रामाणिक सूचना के आधार पर यह खुलासा हुआ कि उसे परीक्षा से पूर्व ही प्रश्नपत्र लीक के माध्यम से मिल गया था।

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​आयोग की शिकायत पर एसओजी ने प्राथमिकी दर्ज कर सघन जांच शुरू की। एसओजी की जांच में सामने आया कि पौरव कालेर नामक मुख्य आरोपी ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर लीक पेपर हल करवाया था और परीक्षा के दौरान ब्लूटूथ के माध्यम से सरोज बिश्नोई तक उत्तर पहुंचाए थे। ​आयोग ने ‘राजस्थान असैनिक सेवाएं (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958’ के नियम 16 के तहत इस मामले में विभागीय जांच शुरू की थी। जांच प्रक्रिया के दौरान आरोपित कर्मचारी ने बीमारी, अस्पताल में भर्ती होने और व्यक्तिगत सुनवाई से बचने के कई बहाने बनाकर कार्यवाही को टालने का प्रयास किया।

लिपिक द्वारा यह विधिक दलील भी दी गई थी कि जब तक आपराधिक मामला न्यायालय में लंबित है, तब तक विभागीय जांच को रोका जाए, परंतु आयोग ने उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के स्थापित न्यायिक दृष्टांतों का हवाला देते हुए इस आपत्ति को सिरे से खारिज कर दिया कि प्रशासनिक शुचिता बनाए रखने के लिए विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमा दोनों समानांतर रूप से चलाए जा सकते हैं।

विभागीय ​जांच रुकवाने गई थी हाई कोर्ट, अदालत ने खारिज किए तर्क

​विभागीय जांच की कार्यवाही पर रोक लगवाने के उद्देश्य से सरोज बिश्नोई ने राजस्थान उच्च न्यायालय (जयपुर पीठ) में रिट याचिका दायर कर एसओजी की एफआईआर संख्या 35/2025 का हवाला दिया था।

मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने उसके तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमा और विभागीय जांच दो अलग-अलग कार्यक्षेत्र हैं।

जहां आपराधिक मामला परीक्षा में नकल और आपराधिक साठगांठ से जुड़ा है, वहीं विभागीय आरोप पत्र शासकीय सेवा में सत्यनिष्ठा की कमी और अशोभनीय आचरण (नियम 3 व 4) से संबंधित है। अदालत ने माना कि ऐसे गंभीर मामलों में अनुशासनिक कार्यवाही पर रोक लगाने का कोई औचित्य नहीं है और स्टे अर्जी को खारिज कर दिया। आयोग ने विभागीय जांच पूर्ण कर अंततः सरोज बिश्नोई को राजकीय सेवा से बर्खास्त कर दिया।

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