14 बार असफलता फिर भी नहीं मानी हार, CDS-SSB पास कर 24 साल के किशु बने सेना में लेफ्टिनेंट


आपको बता दे कि किशु सिंह के मन में सेना में जाने का सपना 2011 में आया था. जब उनकी उम्र महज 9 साल थी. इस साल भारत ने घरेलू मैदान पर क्रिकेट विश्व कप जीता था. इसी जीत ने उनके अंदर देश के लिए कुछ करने की इच्छा पैदा की. इसके बाद करीब 4 महीने बाद स्वतंत्रता दिवस के आसपास उन्होंने टीवी पर देशभक्ति से जुड़ी फिल्म देखी.

देशभक्ति से जुड़ी फिल्म ने किशु सिंह को इतना प्रभावित किया कि उस फिल्म के एक किरदार से प्रेरित होकर उन्होंने तय किया कि वह भारतीय सेना में अधिकारी बनेंगे. वहीं बचपन में लिया गया यह फैसला आगे चलकर उनके जीवन का टारगेट बन गया.

देशभक्ति से जुड़ी फिल्म ने किशु सिंह को इतना प्रभावित किया कि उस फिल्म के एक किरदार से प्रेरित होकर उन्होंने तय किया कि वह भारतीय सेना में अधिकारी बनेंगे. वहीं बचपन में लिया गया यह फैसला आगे चलकर उनके जीवन का टारगेट बन गया.

सेना में अफसर बनने के लिए किशु ने एनडीए समेत कई डिफेंस स्तर की परीक्षा में हिस्सा लिया. एनडीए में कई प्रयासों के बाद भी उन्हें सफलता नहीं मिली और बाद में उम्र सीमा पर होने के कारण उन्होंने इस रास्ते को छोड़कर सीडीएस पर ध्यान देना शुरू किया.

सेना में अफसर बनने के लिए किशु ने एनडीए समेत कई डिफेंस स्तर की परीक्षा में हिस्सा लिया. एनडीए में कई प्रयासों के बाद भी उन्हें सफलता नहीं मिली और बाद में उम्र सीमा पर होने के कारण उन्होंने इस रास्ते को छोड़कर सीडीएस पर ध्यान देना शुरू किया.

उन्होंने यूपीएससी की ओर से आयोजित सीडीएस परीक्षा के साथ एयर फोर्स कॉमन एडमिशन टेस्ट की भी तैयारी की. लिखित परीक्षा के लिए उन्होंने लंबे समय तक अनुशासनात्म तरीके से पढ़ाई की, लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती एसएसबी का इंटरव्यू रहा.

उन्होंने यूपीएससी की ओर से आयोजित सीडीएस परीक्षा के साथ एयर फोर्स कॉमन एडमिशन टेस्ट की भी तैयारी की. लिखित परीक्षा के लिए उन्होंने लंबे समय तक अनुशासनात्म तरीके से पढ़ाई की, लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती एसएसबी का इंटरव्यू रहा.

वहीं एसएसबी असफलता के बाद उन्होंने यह समझने की भी कोशिश की कि आखिर कमी कहां रह गई. उन्होंने अपनी तैयारी और इंटरव्यू के तरीके पर दोबारा काम किया. किशु के अनुसार उन्होंने इंटरव्यू के दौरान खुद को किसी बनावटी तरीके से पेश करने के बजाय अपनी खूबियां और कमजोरी को ईमानदारी से समझना शुरू किया. उनका मानना है कि एसएसबी के दौरान ईमानदार तरीके से खुद को पेश करने से उन्हें मदद मिली और आखिरकार 14वें प्रयास में उन्होंने एसएसबी का इंटरव्यू पास कर लिया.

वहीं एसएसबी असफलता के बाद उन्होंने यह समझने की भी कोशिश की कि आखिर कमी कहां रह गई. उन्होंने अपनी तैयारी और इंटरव्यू के तरीके पर दोबारा काम किया. किशु के अनुसार उन्होंने इंटरव्यू के दौरान खुद को किसी बनावटी तरीके से पेश करने के बजाय अपनी खूबियां और कमजोरी को ईमानदारी से समझना शुरू किया. उनका मानना है कि एसएसबी के दौरान ईमानदार तरीके से खुद को पेश करने से उन्हें मदद मिली और आखिरकार 14वें प्रयास में उन्होंने एसएसबी का इंटरव्यू पास कर लिया.

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इसके बाद मई में सीडीएस परीक्षा में सफलता हासिल करने के साथ चयन प्रक्रिया पूरी हुई और किशु भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बन गए. किशु की तैयारी का तरीका काफी अनुसाशित था. लिखित परीक्षा की तैयारी के दौरान वह सुबह 5 से 6 घंटे गणित पढ़ते थे, इसके बाद करीब 2 घंटे अंग्रेजी और चार से पांच घंटे दूसरे विषयों को देते थे. पढ़ाई के साथ उन्होंने फिजिकल प्रैक्टिस भी जारी रखी. जिससे उनकी शुरुआती तैयारी भी लिखित परीक्षा तक सीमित नहीं थी, बल्कि डिफेंस चयन प्रक्रिया के अगले चरणों को ध्यान में रखकर चल रही थी.

इसके बाद मई में सीडीएस परीक्षा में सफलता हासिल करने के साथ चयन प्रक्रिया पूरी हुई और किशु भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बन गए. किशु की तैयारी का तरीका काफी अनुसाशित था. लिखित परीक्षा की तैयारी के दौरान वह सुबह 5 से 6 घंटे गणित पढ़ते थे, इसके बाद करीब 2 घंटे अंग्रेजी और चार से पांच घंटे दूसरे विषयों को देते थे. पढ़ाई के साथ उन्होंने फिजिकल प्रैक्टिस भी जारी रखी. जिससे उनकी शुरुआती तैयारी भी लिखित परीक्षा तक सीमित नहीं थी, बल्कि डिफेंस चयन प्रक्रिया के अगले चरणों को ध्यान में रखकर चल रही थी.

किशु सिंह बताते हैं कि उनकी इस सफलता के पीछे उनके परिवार का भी बहुत बड़ा हाथ रहा है. किशु के अनुसार जब वह एसएसबी में असफल होने के बाद घर लौटते थे, तब भी परिवार ने उनका हौसला बढ़ाया था. उन्होंने बताया कि हर बार उनके पिता ट्रेन के बजाय फ्लाइट से लौटने के लिए कहते थे. एयरपोर्ट पर परिवार मिठाई लेकर उनका स्वागत करता था, ताकि यह असफलता का असर उनके कॉन्फिडेंस पर ना पड़े.

किशु सिंह बताते हैं कि उनकी इस सफलता के पीछे उनके परिवार का भी बहुत बड़ा हाथ रहा है. किशु के अनुसार जब वह एसएसबी में असफल होने के बाद घर लौटते थे, तब भी परिवार ने उनका हौसला बढ़ाया था. उन्होंने बताया कि हर बार उनके पिता ट्रेन के बजाय फ्लाइट से लौटने के लिए कहते थे. एयरपोर्ट पर परिवार मिठाई लेकर उनका स्वागत करता था, ताकि यह असफलता का असर उनके कॉन्फिडेंस पर ना पड़े.

Published at : 22 Aug 2026 08:38 AM (IST)

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