आज भी अदालत और पुलिस महकमें में क्यों होता है उर्दू शब्दों का इस्तेमाल, कहां से हुई थी इसकी शुरुआत?


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  • कानूनी निरंतरता और प्रशिक्षण के कारण शब्द आज भी प्रचलित.

देश की अदालतों और पुलिस थानों में आज भी कई ऐसे शब्द सुनाई देते हैं, जो सीधे उर्दू भाषा से जुड़े हुए हैं. अदालत में “मुकदमा”, “जमानत”, “गवाह” और पुलिस थाने में “तफ्तीश”, “मुल्जिम”, “बरामदगी” जैसे शब्द आम तौर पर इस्तेमाल होते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर आज के आधुनिक दौर में भी ये शब्द क्यों नहीं बदले? इसकी वजह भारत के इतिहास और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ी हुई है.

भारत में उर्दू और फारसी भाषा का असर मुगल शासन के समय से शुरू हुआ. उस दौर में फारसी राजकाज और अदालतों की मुख्य भाषा मानी जाती थी. सरकारी आदेश, अदालत के फैसले और प्रशासनिक कामकाज फारसी में ही होते थे. इसी दौरान सैनिक कैंपों और बाजारों में कई भाषाओं के मेल से उर्दू भाषा का जन्म हुआ. धीरे-धीरे उर्दू आम लोगों और प्रशासन दोनों के बीच लोकप्रिय होती चली गई. अदालतों और सरकारी दफ्तरों में इसका इस्तेमाल बढ़ता गया.

अंग्रेजों ने भी नहीं बदली भाषा

जब अंग्रेजों ने भारत में शासन संभाला, तब उन्होंने पूरी व्यवस्था को बदलने के बजाय पहले से चल रहे सिस्टम को अपनाया. अदालत और पुलिस विभाग में जो शब्द पहले से इस्तेमाल हो रहे थे, अंग्रेजों ने उन्हें जारी रखा. 1830 के बाद फारसी का इस्तेमाल कम जरूर हुआ, लेकिन उर्दू के कई शब्द कानून और पुलिस व्यवस्था में स्थायी रूप से शामिल हो गए. यही वजह है कि आज भी कई कानूनी दस्तावेज और पुलिस रिकॉर्ड पुराने शब्दों के साथ दिखाई देते हैं.

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कानूनी व्यवस्था में बनी रही पकड़

विशेषज्ञों के मुताबिक अदालत और पुलिस विभाग में उर्दू शब्दों के बने रहने की सबसे बड़ी वजह कानूनी निरंतरता है. भारतीय दंड संहिता, पुलिस नियमावली और पुराने कानूनी दस्तावेज दशकों से इन्हीं शब्दों में लिखे गए हैं. अगर अचानक सभी शब्द बदल दिए जाएं, तो उनके मतलब और कानूनी व्याख्या को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है. यही कारण है कि “मुल्जिम”, “जमानत”, “तफ्तीश” और “मुकदमा” जैसे शब्द आज भी कामकाज का हिस्सा बने हुए हैं.

अधिकारियों की ट्रेनिंग भी बनी वजह

पुलिस और न्याय विभाग के अधिकारियों की ट्रेनिंग भी लंबे समय से इन्हीं शब्दों के साथ होती रही है. थानों से लेकर अदालतों तक यही भाषा कामकाज का हिस्सा बन गई. पुरानी पीढ़ी से लेकर नए अधिकारियों तक, सभी इन शब्दों को आसानी से समझते और इस्तेमाल करते हैं. यही वजह है कि रोजमर्रा के प्रशासनिक कामों में इनका चलन आज भी जारी है.

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आम लोगों के लिए मुश्किल बनती भाषा

हालांकि अब समय के साथ भाषा को आसान बनाने की मांग भी बढ़ रही है. कई लोगों का कहना है कि अदालत और पुलिस की भाषा इतनी सरल होनी चाहिए कि आम आदमी भी उसे आसानी से समझ सके. कई बार पुलिस रिपोर्ट या कोर्ट के दस्तावेज पढ़कर लोगों को समझ ही नहीं आता कि आखिर लिखा क्या है. कठिन उर्दू शब्दों की वजह से लोग कानूनी प्रक्रिया से खुद को दूर महसूस करते हैं.

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कई राज्यों ने शुरू किया बदलाव

इसी समस्या को देखते हुए अब कई राज्य सरकारें भाषा को आसान बनाने की दिशा में काम कर रही हैं. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में पुलिस विभाग ने कठिन उर्दू शब्दों की जगह सरल हिंदी शब्द शामिल करने की पहल शुरू की है.

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