आखिर कौन हैं वर्दी की शान बढ़ाने वाला राजा? विदेश से पढ़ाई करने के बाद ज्वाइन की थी सेना, लेते थे इतनी सैलरी


Show Quick Read

Key points generated by AI, verified by newsroom

  • भवानी सिंह ने सेना में अफसर बनकर देश सेवा को चुना.
  • 1971 युद्ध में 10 PARA का नेतृत्व कर महावीर चक्र जीता.
  • राजघराने के होते हुए भी मात्र ₹1 मासिक वेतन लिया.
  • 1951 से 1975 तक भारतीय सेना में सेवाएं दीं.

राजघराने में जन्म, शाही परवरिश और आराम की जिंदगी ब्रिगेडियर महाराजा सवाई भवानी सिंह के पास यह सब था. फिर भी उन्होंने सबसे पहले चुना भारतीय सेना की वर्दी. उनकी कहानी खास इसलिए है क्योंकि उन्होंने सेना में ऊंचे पद पर रहते हुए भी केवल 1 रुपया प्रति माह वेतन लिया. यह फैसला नियम से नहीं, उनकी अपनी सोच और देशभक्ति से जुड़ा था.

भवानी सिंह ने दून स्कूल और हैरो (यूके) में पढ़ाई के बाद देहरादून की भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) से प्रशिक्षण लिया. 1954 में उन्हें भारतीय सेना की 3rd कैवेलरी रेजिमेंट में कमीशन मिला. यहां से उनका असली फौजी सफर शुरू हुआ. वे किसी महाराजा की तरह नहीं, बल्कि एक सामान्य अधिकारी की तरह सख्त ट्रेनिंग, अनुशासन और जिम्मेदारियों के साथ आगे बढ़े.

समय के साथ उन्होंने अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाईं, लेकिन 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध उनकी फौजी जिंदगी का सबसे बड़ा अध्याय बना. उस समय वे पैराशूट रेजिमेंट की 10वीं बटालियन (10 PARA) का नेतृत्व कर रहे थे. यह यूनिट खास ऑपरेशनों के लिए जानी जाती है. दुश्मन के इलाके में जाकर मिशन को अंजाम देना, सैनिकों का हौसला बनाए रखना और रणनीति के साथ आगे बढ़ना इन सबमें भवानी सिंह ने बेहतरीन नेतृत्व दिखाया.

See also  CBSE Class 12 Result 2026 Live Updates: When will CBSE Board Out 12th Result 2026 Date, Time Direct Link at results.cbse.nic.in

यह भी पढ़ें – BPCL में जूनियर एग्जीक्यूटिव से एसोसिएट एक्जीक्यूटिव तक की भर्ती, 17 मई से पहले कर लें आवेदन

महावीर चक्र से किया गया था सम्मानित
उनकी बहादुरी और सूझबूझ के लिए उन्हें देश का दूसरा सबसे बड़ा वीरता सम्मान महावीर चक्र (MVC) दिया गया. यह सम्मान केवल साहस के लिए नहीं, बल्कि असाधारण नेतृत्व और जोखिम भरे ऑपरेशन को सफल बनाने के लिए दिया जाता है.

लेकिन उनकी कहानी का सबसे अलग पहलू वेतन से जुड़ा है. सेना में एक अधिकारी के तौर पर उन्हें पूरा वेतन और सुविधाएं मिलनी थीं. फिर भी उन्होंने फैसला किया कि वे केवल 1 रुपया महीना ही लेंगे. उनका मानना था कि जब वे पहले से ही संपन्न हैं, तो देश की सेवा के बदले वेतन लेना सही नहीं. यह त्याग आज भी भारतीय सेना के इतिहास में एक अनोखी मिसाल माना जाता है.

कब से कब तक दी सेवाएं?
1951 से 1975 तक उन्होंने सेना में सेवाएं दीं. इतने लंबे समय तक सक्रिय फौजी जीवन जीना, युद्ध का नेतृत्व करना और फिर भी सादगी बनाए रखना यह उनके व्यक्तित्व की पहचान थी. वे अपने साथियों के बीच एक सख्त लेकिन प्रेरक अधिकारी के रूप में जाने जाते थे.

यह भी पढ़ें – UPSC Recruitment: UPSC ने निकाली इन पदों पर भर्ती, लाखों में मिलेगी सैलरी; पढ़ें डिटेल्स

Education Loan Information:
Calculate Education Loan EMI



Source link

See also  IIT Bombay announces its first-ever overseas sub-campus in US | Education News

Leave A Comment

All fields marked with an asterisk (*) are required